Locks continues 6
....पांच मिनट आराम की सांस लेने के पश्चात् वह बोला- "डार्लिंग....प्रेरित की क्या रिपोर्ट है?....."
"आपने जैसा कहा, उसने वैसा ही किया है.....शुभम् कम्पनी के औफिस में रात को कीमेकर को संग ले जा उसने डुप्लीकेट चाभी बनवा वहां के सारे महत्त्वपूर्ण डाक्युमेण्ट्स स्कैन कर लिये, और सीडीज कौपी कर ली....तत्पश्चात् सबकुछ यथावत् रखा हुआ छोड बाहर ताला लगा ऐसे लौट आये जैसे वहां कोई घुसा ही नहीं था....और शोभन की भी सूचना....नेहा के गर्भवती हो होनेवाले बच्चे के डीएनए टेष्ट के द्वारा पिता ज्ञात हो जाने पर विवाह का क्लेम की बात पर कल रात भेजे गये दो व्यक्तियों ने उसके कक्ष में घुस उसे इतनी फाष्ट फकिंग दी उसका होनेवाला बच्चा गर्भ में ही मर गया....इस प्रकार इस समस्या का समाधान हो गया..... पर एक सूचना अच्छी नहीं है...."
"क्या हुआ....?"
"आपने राज को किसी को परेशान करने को कहा था.....राज इसपर बोला -”अब बौस बौस नहीं रह गये, गैंग्लीडर हो गये हैं.....अपने ऐम्प्लौयिज से क्या नहीं करवा लें.......जो न करें उनके लिये एक ही धमकी है - ’जौब से निकाल दूंगा’.....और ऐम्पलौयिज भी अब कुर्सी से चिपके ही रहना चाहते हैं....बौस के आदेश पर चोरी, धमकी, बलात्कार, हत्या आदि चाहे जो भी अनुचित करना पडे वे करने को उद्यत हैं....फीमेल्स भी कुर्सी नहीं छोडना चाहती, भले ही इसके लिये अपना तन एक बार अनेक बार एक व्यक्ति को अनेक व्यक्ति को सौंपना पडे.....भारत में अधिकतर छोटी ही कम्पनियां, औफिसेज, शौप्स आदि हैं जहां एम्प्लायर्स फीमेल ष्टाफ की मार दनादन करते हैं.......पर भारत में कुछ प्रतिशत में बडी कम्पनियां, औफिसेज, मौल्स आदि शौप्स आदि भी हैं जहां एम्प्लायर्स और सीनियर्स दोनों फीमेल ष्टाफ्स की मार दनादन फकिंग करते हैं....क्या दशा हो जाती होगी स्त्री के मुख और पूरे शरीर की....!.. कुछ एम्प्लायर्स ने अभी ऐसा करना आरम्भ नहीं किया होगा....पर जिस तीव्र गति से और निर्भयता से यह बढता जा रहा है उससे प्रेरणा ले वे भी शीघ्र या विलम्ब गड्ढों में कूद ही पडेंगे.... बहती गंगा में हाथ धोना सबको अच्छा लगता है....जान पडता है कि फीमेल्स को कहीं काम करने भेजना अब उनको वेश्या बना देने जैसा हो गया है ’..."
"हूं....देखता हूं.....इसे यहीं सोने दो...तुम चलो अन्दर....प्रातः चार-पांच बजे अब जाना...." दोनों अन्दर चले जाते हैं....समर यह देख वह भी प्रातः चार बजे तक सोने का विचार कर सिकुडा सोया रहता है....प्रातः काल उसकी नीन्द उस डार्लिंग के स्वर से टूटती है....वह अपनी पुत्री को तुरत आने को कह द्वार बाहर निकल जाती है...पुत्री अंगडायी ले उठने का प्रयास कर रही है...अवसर देख समर वहां से निकल जाता है...वह गेट की ओर झांककर देखता है तो वहां एक पुलिस्वाला कभी आंखें खोलता तो कभी इधर-उधर घूरता दिखता है...जबकि वाच्मैन झुकता-झुकता सो रहा है....समर ने मन में सोचा कि एक पुलिस्वाला इधर है तो द्वितीय पीछे के साइड होगा...वह पीछे की ओर जा देखता है तो वहां वह द्वितीय घूमता दिखता है....वह बहुत सावधान नहीं जान पडा....समर ने सावधानी से उसे दीवार की विपरीत दिशा में निहारता देख दीवार फान्द विना ध्वनि किये तीव्र गति से चलना आरम्भ किया....कुछ मिनटों पश्चात् पुलिस्वाले ने पुनः दीवार से लगे-लगे चारों ओर देखता चलना आरम्भ किया...अभी कुछ उजाला होता जा रहा था....सहसा उसके टार्च की किरण समर के जूते के चिह्नों पर पडी....वह चिल्लाया...तुरत उसने सीटी बजायी....उसका सहकर्मी दौडा आया....उसने भी वह देख तुरत उन चिह्नों के पीछे दौड लगायी....समर वहां से भागता-भागता नाले-खेत-रोड सब पार करता एक प्रातःकालीन विद्यालय को पहुंचा....गेट से अन्दर घुस एक कक्षा में किसी शिक्षक को न देख उसमें घुस गया...
"सर...आप हमलोगों को क्या पढायेंगे? सर, बताइये न...."
समर चुप रहा।
द्वितीय, तृतीय छात्र ने भी ऐसे ही प्रश्न दुहराया...
समर को तब भी चुप देख एक छात्र ने पूछा- "सर, हमलोग इतने समय से पूछ रहे कि आप क्या पढायेंगे, आप बताते क्यों नहीं?"
"तुमलोग ही तो कह रहे हो कि बताइये न अर्थात् मैं न बताऊं....तब मैं क्यों बताऊं ?..."
"पर सभी लोग तो ऐसे ही बात करते हैं - आइये न, खाइये न...जाइये न...."
"जो-जो ऐसे बोला करते हैं वे सभी उल्लु हैं....."
"पर मेरे मां-पिता श्री भी ऐसे ही बातें किया करते हैं, तो क्या वे भी उल्लु हैं?????”
"अं....!!!...." समर ने आंखें फाडीं....
"मेरा जन्म दो उल्लुओं से हुआ है....अंऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ" वह गला फाड चिल्लाया....सारी कक्षा हंसने लगी.....
"चुप....तुम हंसी कर रहे हो मेरे संग!!!!!!"
इतने में एक शिक्षक आ बाहर खडा हुआ....
"सर...अभी जो हमारा विषय है उसके शिक्षक आ गये हैं...."
समर उस शिक्षक की ओर मुस्कुरा देखता बाहर निकल जाता है....वह इधर-उधर टहल एक बेंच पर बैठ जाता है....उधर पुलिस्वाले विचार करते हैं कि यहां से यदि भीड बाहर निकलने लगी तो किसी का भी जूता-चिह्न अभिजाना नहीं जा पायेगा...अतः एक अन्दर जा पदचिह्नों का अनुसरण करे....एक पुलिस्वाला अन्दर घुसता है....तुरत ही उसे उस जूते के चिह्न मिलने लग जाते हैं....वह द्वितीय को भी दिखलाता है....दोनों ही पीछा करते जाते हैं....चिह्न उसी कक्षा की ओर जा रही है....पर समर यह बात देख लेता है....और अभी दोनों पुलिस्वाले उस कक्षा से बहुत दूर हैं तभी समर कक्षा की ओर जाते चिह्नों को मिटा वहां से वह बढता विद्यालय के पिछवाडे में दीवार फान्द बाहर भाग निकलता है....वह जानता है शीघ्र ही दोनों उसके पीछे इधर भी आयेंगे पर इस बात का सन्तोष है कि वे कक्षा में जायेंगे...क्योंकि वहां जानेपर छात्र उसकी रूपरेखा बता दे सकते थे...कभी अभिजान भी ले सकते थे....आगे बढते वह एक चाल-जैसे क्षेत्र में घुस जाता है....एक स्त्री चश्मा पहने एक खाट पर बैठी है...उसके समक्ष एक समाचारपत्र रखा है.....जब समर वहां से गुजरता है तो वह उसे स्वर देती है..."एऽऽऽऽ..सुन इधर.... पढना-लिखना आता है तुझे????" समर हां कहता है... "तो चल, यह समाचारपत्र पढ सुना....."
"आज वर्षा अच्छी होने की सम्भावना है....चुनाव प्रत्याशियों ने निज सम्पत्तियों की घोषणा की....केरल के बाढ-पीडितों की सहायता के लिये पूरे देश में चन्दे एकत्र किये जा रहे हैं...."
"अरे मुझे अच्छे-से दिखता नहीं..पर मैंने टीवी पर इतना देखा कि वे बाढ-पीडित अब भी वैसे ही कठिनाइयों में जी रहे हैं....चन्दा एकत्र करो.....कोक-पेप्सी पीओ, व्यंजन पर व्यंजन खाओ...आराम की यात्रा करो....कितने परिश्रम से इतना एकत्र किया....तो इसका उपभोग क्या बाढ-पीडित लोग करेंगे? नहीं...ये एकत्र करनेवाले ही करेंगे...और वस्त्र जो पीडितों के नाम एकत्र किये गये उन्हें थोक में बेच दो....उन्हें सी-सिला पुनः विक्रय-योग्य बना बेच दिया जायेगा...."
वह स्त्री जबतक बोलना बन्द करे तबतक समर वहां से खिसक चुका था....कुछ समय पश्चात् दोनों पुलिस्वाले आ उस स्त्री से पूछे पर वह समर के सम्बन्ध में कुछ बता नहीं पायी....समर उस क्षेत्र से निकल एक स्थान में घुसा...देखा तीन-चार खिडकियों पर लोगों की पंक्तियां लगी हैं....
"ये यहां पर लाइन क्यों लगी है?...."
"टिकट, टिकट....कहां जाने का??"
"लोकल ट्रेन का भी?.."
"और क्या....कहीं और जाने का तो अगले ष्टेशन पर जाओ...."
समर ने विना विलम्ब किये अपने आवास लौटने को एक दिन का औलरूट पास लिया और विना विलम्ब किये उससे विपरीत दिशा में जा रही एक ट्रेन में बैठ अगले ष्टेशन पर उतर पुनः निज आवास की दिशा में जा रहे ट्रेन में बैठ निज आवास पहुंच गया....विस्तर पर लेट उसने आराम की सांस ली....उसे विश्वास थी कि पुलिस उसे अब कभी पकड नहीं पायेगी.....कुछ समय आराम करने के पश्चात् वह उठा और टीवी खोला...टीवी पर समाचार आ रहे थे....पर यह क्या!!! प्रमुख समाचारों में उस ज्वेलरी शौप में लूट के प्रयास की घटना दिखायी जा रही थी....उसके जूते के चलने के चिह्न भी दिखाये गये.....समर को अपनी सांसें रुकती-सी जान पडीं....उसने विना विलम्ब किये दोनों जूतों को तेज धार से काटना आरम्भ किया....तत्पश्चात् उन्हें एक पौलिथीन में पैक कर अपने बैग में रख बाहर निकला....कुछ दूर जानेपर एक बहता खुला नाला दिखा....उसने इधर देखा और उधर देखा और उसमें वह पौलिथिन खोल सभी टुकडे एक संग डाल दिये....टुकडे अलग-अलग बहते-डूबते नाले में खो गये....पुनः आवास आ आराम से लेटा...अब वह स्वयम् को कुछ निश्चिन्त अनुभूत कर रहा था....-’यह जौन की दी बुद्धि थी जो मैंने धनवान् बनने को ऐसा उपाय विचारा....जीवन मेरा डूबते-डूबते बचा....भगवा