Locks continues 5
सडक पर आते-जाते वाहनों और व्यक्तियों की दृष्टि में कभी-कभी आ जा सकती है.....अल्प ही आवागमन हो रहा है....कोई उधर ध्यान भी नहीं दे रहा कि उस घुप्प अन्धेरे में क्या हो रहा है..... ऐसे में समर बहुत सरलता से सफल हो सकता है....पर...ये कौन-सा वाहन आ रहा है....ये तो पैट्रोलिंग पुलिस की जिप्सी है....चारों ओर आंखें फाड निरीक्षण करते गुजरते हैं....उनमें एक की दृष्टि समर की ओर पड ही जाती है कि वहां अन्धेरे में कोई किरण निकली-छुप गयी सी दिखी है...वह जीप रुकवाता है....उसके हाथ में बडा टार्च है पर वह विना टार्च जलाये ही वहां की बात जानना चाहता धीमे-धीमे पगों से आगे बढता है....इधर समर जीप रुकते ही तुरत सभी उपकरण वहीं छोड वहां से आगे की ओर सरकने लगता है....अन्धेरे में पुलिस्वाला उसे देख नहीं पाता है....पुलिस्वाला शटर को पहुंच कुछ भी समझ न आने पर टार्च जलाता है....देखता है ताले खोलने के उपकरण पडे हैं.....वहां से किसीके जूते के चिह्न भी आगे बढते दिख रहे हैं....चिह्नों का अनुसरण करता वह कुछ आगे बढता है तो छोटी दीवार के पीछे गार्ड अचेत पडा मिलता है....ओ......वह मुंह खोलता है और टार्च की लाइट जूते के चिह्नों पर आगे बढाता जाता है.....फोकस दूर जाते समर पर पडती है....दूर स्थित समर अभिजाना तो नहीं जाता है पर वह तुरत वहांसे भागना आरम्भ करता है जबकि जिप्सी से दो पुलिस्वाले उसके पदचिह्नों...नहीं... जूते चिह्नों को देखते उसका पीछा करने दौड पडते हैं....वायरलेस पर इन दोनों पुलिस्वालॊं को सन्देश मिलता है कि ’उस व्यक्ति ने गार्ड को अचेत कर ज्वेलरी शौप लूटने का प्रयास किया है....चाहे जैसे भी हो उसे पकड कर ही लौटना....यदि रिक्त हाथ लौट आये...तो तुम दोनों....’ यह सुन दोनों घबडा गये....एक समर के पदचिह्नों के पीछे दौड लगा रहा था तो द्वितीय ने कुछ रुककर उन जूते-चिह्नों की अपने मोबाइल से कुछ रिकार्डिंग भी कर ली....पुनः उसने तीव्रगत्या दौड लगायी और वह निज सहकर्मी के संग हो लिया...समर भागता-भागता एक अपार्ट्मेण्ट की दीवार फान्द अन्दर घुस गया....वह वाचमैन की दृष्टि से बचता सीढियों से ऊपर चढने लगा....इधर ये दोनों अपार्ट्मेण्ट की दीवार के समीप से जूते-चिह्नों को अदृश्य पाते हैं....वे तुरत वाचमैन से कहते हैं कि अन्दर एक चोर घुसा है...
"कब घुसा?..."
"अभी...कठिनाइ से दो-चार-पांच मिनट हुए होंगे..."
"मैं बडी सावधानी से...सचेत इधर चारों ओर देख रहा हूं....अभी आधे घण्टे से न तो कोई यहां आया है, न ही कोई बाहर निकला है..."
"पर जूते के चिह्न यहीं आकर अन्त हो रहे हैं....वो सामने दीवार से चोर अन्दर कूदा है...."
"और मैं क्या उस समय कहीं बाहर गया था...या सो रहा था जो उसे नहीं देखा?.. मेरी क्या यहां से छुट्टी करवाना चाहते?...”
"देख वाच्मैन...मुझसे बहस न कर....इस अपार्ट्मेण्ट की चार दीवारों से इन दो दीवारों को मैं देख रहा हूं....ये मेरा सहकर्मी तुम उस साइड की दोनों दीवारों पर दृष्टि रखो....और तुम वाच्मैन....अन्दर प्रत्येक फ्लैट में बारी-बारी से जा सर्च करो, कोई चोर कहीं घुसा मिल ही जायेगा...यदि बाहर निकल भागता नहीं है तो....चलो....जाओ......" दोनों वैसा ही करते हैं.... उधर समर ऊपर चढता एक फ्लैट के द्वार को हाथ लगाता है तो वह खुल जाता है....वह चुपके से अन्दर घुसता है....समीप उस फ्लैट की पानी की टंकी दिखती है....वह वहां चढ उसके पीछे छिप जाता है....चुप सिकुडा लेटा है...धीरे-धीरे उसे नीन्द आने लग जाती है.....वह जानता है कोई वहां तो किसी काम से, वह भी रात में तो आयेगा नहीं....कुछ समय पश्चात् सहसा खट-खट-खट सुनायी देती है जिससे उसकी नीन्द खुल जाती है....वह चुपके से देखता है....समक्ष हौल है....अन्दर वाले कक्ष से एक अधेड निकलता है - "अरे डार्लिंग...तुम्हारे लिये तो मैं द्वार खुला ही रखता हूं....इतनी खटखट....आज तुम..." द्वार खोलता है तो समक्ष वाच्मैन को पाता है....
"सर....अन्दर कोई चोर तो नहीं आया है ?...."
"क्यों! आज चोरों की मीटिंग है क्या...?"
"नहीं, दो पुलिस्वाले आये हुए हैं....कहते हैं इस अपार्ट्मेण्ट में एक चोर घुसा है....मुझे सभी फ्लैटों में अन्वेषने भेजा है..."
"हूं....मेरी जानकारी में तो नहीं है...तुम सर्च करो...क्या जाने कहीं से निकल जाये...."
"सर...आप यहीं द्वार पर रहिये...मैं सभी कक्षों में अन्वेषता हूं..."
"ऐं....बहुत चतुर समझता अपने को?....अन्दर नोटों के बण्डल खुले पडे हैं....एटीएम, क्रेडिट कार्ड्स रखे पडे हैं....वे सब मैं तुझे सौंप दूं और यहां द्वार पर खडा-खडा मैं भिखारी बन जाऊं!!!! ये मैंने सिटकिनी अन्दर से लगा दी...अब चल मेरे संग....देखता हूं....चोर पूर्व आया था या अभी आया है...." दोनों संग में अन्दर सभी स्थानों पर अन्वेषते हैं....तत्पशचात् निकल द्वार के समीप पहुंचते हैं..."ये देख सिटकिनी अभी भी लगी हुई है....यदि कोई चोर अन्दर आया रहा होता तो सिटकिनी खोल अभी तक भाग गया होता...क्या बोलता तू...?"
"क्या मैं बोलूं!!!"
"चल, अदृश्य हो जा मेरी आंखों से..." ऐसा कह वह द्वार खोल पुनः सिटकिनी चढा देता है....’ये...डार्लिंग को आ जाना चाहिये था...अभी तक आयी क्यों नहीं...!’ वह वहां खडा सोच रहा था जिसके ऊपर पानी टंकी के पीछे छिपा समर यह सब देख-सुन रहा था....तभी उस व्यक्ति को द्वार कुछ हिलता-सा जान पडा....यह देख वह घबडाया-’कहीं चोर तो नहीं द्वार खोलने का प्रयास कर रहा है....पर मेरा साहस भी किसीसे न्यून नहीं....अन्य स्थानों पर फियर्लेस्ली की जा रही ऐसी बातों की सूचना से प्रेरणा पा मैंने एक ही दिन औफिस में सभी के संग मार दनादन किया...इतना साहस कितनों के संग है!!! अभी देखता हूं इस चोर के बच्चे को....’ ऐसा विचार वह अन्दर गया और पिस्तौल ले आया....धीमे से सिटकिनी खोल द्वार के पीछे छुपा....दो पैर अन्दर घुसते देखा उसने...उसने उसके सर पर पिस्तौल सटाया और बोला -"हैण्ड्स अप...." वह एक स्त्री थी....वह चिल्लायी.... "अरे...डार्लिंग तुम....." उसने फटाक से द्वार बन्द किया और उसे बांहों में ले उस हौल में सोफा पर बैठ गया...."इतना विलम्ब कैसे हुआ!....."
"बेटी को मना रही थी...वह आने को तैयार नहीं हो रही थी...”
"अब मान तो गयी हां...कहां है वो?"
"द्वार पर ही खडी होगी..."
वह व्यक्ति द्वार खोल एक १५ - १६ वर्ष की लडकी के कन्धे पर हाथ रख कहता है - "आजा बेटी, अन्दर आ जाओ...."
"बेटी??????" वह क्रोध दिखलाती है....अन्दर आ मां के संग बैठ जाती है....
"अरे...यहां कहां...अन्दर चलो...." उसे उठा ले जाने लगता है...पीछे से मां बेटी को संकेत करती है कि वह आगे वाले कक्ष में जाये... तब जैसे ही वह व्यक्ति उसे उससे पूर्व वाले कक्ष में ले जाना चाहता है, वह उसके अगले कक्ष में ही चलने का आग्रह करती है....हारकर वह उसे उसी कक्ष में ले जाता है....अन्दर घुसते ही वह देखती है विस्तर पर नोटों की कई गड्डियां पडी हैं....
"ये तीन-चार गड्डियां मुझे दे दो...मैं निज जीवन संवारुंगी...."
"ये क्या बोल रही हो तुम...मैंने तो आजतक विना रुपये दिये ही लिया है...."
"लिया होगा....अपनी ऐमप्लौयिइज को....मैं उनमें नहीं....यदि चाहिये तो देने ही होंगे..."
"अच्छा....ये एक ले ही लो तो....."
"एक नहीं, ऐट लीष्ट दो...” वह दृढ स्वर में बोली....
"अं....अच्छा...चलो...तुम निज मन को तृप्त कर लो....मैं भी निज मन को तृप्त किये विना नहीं छोडुंगा...."
कुछ समय पश्चात् दोनों बाहर हौल में निकल आये....लडकी थकी-सी निज ब्लाउज में दोनों गड्डियां डाली हुई सोफे पर लेट सो गयी...वह व्यक्ति भी द्वितीय सोफे पर आराम से प्रसर बैठ गया....<